STOP CORONAVIRUS

कोरोना लॉकडाउन: जब दिल्ली ने सैकड़ों ‘मजबूरों’ को शहर छोड़कर जाते देखा



उत्तर भारत में मज़दूरी कर रहे, छोटे काम धंधे कर रहे तमाम बेघर लोग बीते कुछ दिनों से देश की राजधानी दिल्ली को पार कर रहे हैं.

इनमें हरियाणा के पानीपत, करनाल, अंबाला, राजस्थान के जयपुर, अजमेर, पंजाब के लुधियाना, जलंधर और चंडीगढ़ समेत कई अन्य शहरों से आये वो लोग हैं जो दिल्ली पार करके उत्तर प्रदेश के एटा, आगरा, मथुरा, रामपुर, बरेली, सीतापुर, हरदोई, अमरोहा और राजस्थान के अलवर, भरतपुर में अपने घर लौट रहे हैं.

दिल्ली की सड़कों पर दिख रही सैकड़ों की इस भीड़ में वे लोग शामिल हैं जो पास के राज्यों में काम करते थे और लॉकडाउन का आदेश आने के बाद या उससे कुछ पहले अपने-अपने घरों को पलायन करने के लिए मजबूर हैं.

शुक्रवार शाम को एक ज़रूरी दवा लेने के लिए मुझे घर से निकलना पड़ा. उस वक़्त हल्की बारिश हो रही थी. ज़्यादातर सड़कें वीरान थीं. पर दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे और रेलवे स्टेशन को जाने वाली सड़क पर ‘क़स्बे से दशहरे का मेला देखकर लौट रही लोगों की भीड़’ जैसा माहौल था.

बारिश से बचने के लिए सभी लोग मेट्रो के पुल के नीचे बड़े ही व्यवस्थित तरीक़े से एक कतार में आगे बढ़ रहे थे.

मज़दूर

मज़दूर की कोई मज़हबी पहचान नहीं होती

कुछ आगे चलकर लोगों का एक बड़ा जत्था रेलवे स्टेशन से क़रीब दो किलोमीटर पहले ब्रिज के नीचे खड़ा मिला जिसे देखकर पहले लगा कि कोई खाना बाँट रहा है, जिसके लिए भीड़ उमड़ पड़ी है.

लेकिन रेहड़ी-रिक्शे वालों और हाथ में कुछ सामान लिए लोगों की यह भीड़ तेज़ हो चुकी बारिश से बचने की कोशिश कर रही थी. पास ही खड़ी पुलिस-गाड़ी की लाल-नीली रोशनी इनके चेहरों पर चमक रही थी जो लोगों की बेचैनी को एक नाटकीय रूप दे रही थी.

इस भीड़ की कोई मज़हबी पहचान समझ नहीं आती. दिखाई देते हैं तो कई मजबूर परिवार, बूढ़े, बच्चे और दिव्यांग जो अपना सब कुछ एक थैले में समेटकर, बस निकल आये हैं.

यहाँ एक परिवार दिखा जिसमें दो बच्चे हैं. दोनों की उम्र पाँच साल से ज़्यादा नहीं होगी. दोनों ने नये-चमकीले कपड़े पहने हैं, शायद वो नए कपड़े जो उनके माँ-बाप ने किसी मौक़े पर घर जाने के लिए सिलवाए होंगे.

लॉकडाउन के बीच

परिवार के सामान को घेरे बैठीं इनकी माँ दोनों के चेहरे पर बंधे रुमाल को बार-बार ठीक कर रही हैं. जबकि दोनों मियाँ-बीवी के पास मुँह पर बांधने के लिए कुछ नहीं है.

यहाँ लाल फ़्रॉक पहने वो बच्ची भी हैं जिसे कुछ देर पहले मैंने भीड़ में सिर पर कुछ सामान रखकर चलते देखा था. वो अब अपनी माँ से सवाल नहीं पूछ रही और माँ उसके पैर दबा रही हैं.

लॉकडाउन के बीच ये लोग पैदल ही निकल आये हैं. इनमें कुछ हैं जो बीते तीन-चार दिन से लगातार चल रहे हैं.

इनमें दिहाड़ी मज़दूर हैं, कारीगर-मिस्त्री हैं, छोटी-दुकानों पर काम करने वाली लेबर है, रिक्शा चालक हैं, घरों में चोका-बर्तन करने वाली महिलाएं हैं, और ये सभी वो लोग हैं जो मौजूदा व्यवस्था में अपने लिए दूसरे शहर में रहने का ठिकाना नहीं बना पाए. कुछ का कच्चा ठिया तो था, पर खाने-बनाने के पैसों का सवाल उनके सामने था.

भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने बताया कि जिनके यहाँ काम करते थे, उन्होंने कह दिया कि जान बचाओ, सलामत रहे तो बुला लेंगे. कुछ ने कहा कि बंद कब तक है पता नहीं, तो काम का कैसे बता दें. पर कुछ ने अपने हिस्से की शर्म रखी और कुछ पैसे देकर कहा कि हो सके तो घर चले जाओ.

मज़दूर

अपने ठिकानों पर पहुंचने का साहस

इनमें वो लोग भी हैं जो असल में बहुत ज़्यादा डरे हुए हैं. उन्हें फ़िलहाल बस अपना घर दिखाई दे रहा है. वो इस घड़ी में उनके साथ होना चाहते हैं जिन्हें कभी भी उनकी ज़रूरत पड़ सकती है. साथ ही कोरोना को एक ‘शहरी’ बीमारी मानते हुए इन्हें अपना गाँव ज़्यादा सुरक्षित दिखाई दे रहा है.

पलायन कर रहे लोगों की संख्या को देखकर डर लगता है. पर रात के अंधेरे में लंबी दूरी के सफ़र पर निकले इन लोगों का सहारा कोई सरकार या व्यवस्था नहीं, बल्कि ऊपरवाला है, ऐसा इनका मानना है.

शायद यही वजह है कि भीड़ में मुट्ठियाँ और दाँत भींचे खड़े अधिकांश लोगों के चेहरों पर चिंता तो है, मगर उनकी आँखों में अपने-अपने ठिकाने तक पहुँचने का साहस भी साफ़ दिखाई देता है.

रास्ते में पुलिस, प्रशासन या सरकार की तरफ से क्या सहयोग मिला और क्या परेशानियाँ आईं, इस बारे में कम ही लोग बोलना चाहते हैं. और बीते कुछ दिनों में सरकार की तरफ़ से क्या-क्या घोषणाएं हुईं और फ़िलहाल कैसी स्थिति है, इसकी जानकारी भी इनमें कम ही लोगों को है.

कोरोना वायरस

भीड़ दिखाई दे रही है…

चिंताओं से घिरे इस वर्ग में सही सूचना का कितना अभाव है, इसका पता भीड़ में शामिल लोगों को सुनकर होता है.

लगता है, जैसे इस हाल में ये लोग उम्मीद की सभी चालें चल देना चाहते हैं.

एक बड़े बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पर खड़े इन लोगों को उम्मीद है कि वहाँ से इन्हें कुछ ना कुछ तो ज़रूर मिल जाएगा.

इस वजह से भी दिल्ली बॉर्डर के इस हिस्से पर सबसे अधिक भीड़ दिखाई दे रही है.

यहाँ एक आदमी को जब मैंने बताया कि बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से कुछ नहीं मिलेगा तो उन्होंने इतना ही पूछा कि ‘पुलिस रोक तो नहीं रही?’

Source: https://www.bbc.com/hindi/india-52075942



0 0 vote
Article Rating

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © 2020 Gopalganjnews. All Rights Reserved.
Powered by SBeta TechnologyTM